शांति सोनी का विशेष लेख : गंगादशहरा बना पर्यावरण संरक्षण, जल-संरक्षण और प्रकृति संतुलन का महापर्व “यदि जल बचेगा तभी कल बचेगा” — गंगादशहरा पर प्रकृति संरक्षण और वैज्ञानिक चेतना का दिया संदेश

 “जल ही जीवन का जप है, जल ही धरती की शान,

जल बिन सूना जगत सारा, जल से मुस्काएँ सबके प्राण।

गंगा केवल धारा नहीं, संस्कृति का है सार,

इसके निर्मल स्पर्श में बसता भारत का विस्तार।”







भारतीय संस्कृति में पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं होते, बल्कि वे जीवन-दर्शन, प्रकृति चेतना और सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रेरक स्रोत होते हैं। इन्हीं महान पर्वों में गंगादशहरा का विशेष महत्व है, जो केवल आस्था का उत्सव नहीं बल्कि पर्यावरण संरक्षण, जल-संरक्षण, प्रकृति संतुलन और वैज्ञानिक चेतना का महापर्व बनकर भारतीय जनमानस को जागृत करता है। इस विषय पर अपने विशेष लेख में साहित्यकार एवं लेखिका शांति सोनी ने गंगा, हिमालय और प्रकृति संरक्षण के महत्व को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है।

शांति सोनी ने अपने लेख में कहा कि गंगा भारत की आत्मा है। वह केवल एक नदी नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था, संस्कृति और जीवन का आधार है। हिमालय की गोद से निकलकर मैदानों को सींचती हुई गंगा मानव सभ्यता को जीवन प्रदान करती है। भारतीय संस्कृति ने गंगा को “माँ” का दर्जा दिया है, क्योंकि वह बिना किसी भेदभाव के समस्त मानवता का पालन-पोषण करती है।

उन्होंने लिखा कि गंगादशहरा पर्व ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को मनाया जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार इसी दिन राजा भगीरथ की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर माँ गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं। यह कथा केवल धार्मिक आख्यान नहीं, बल्कि मानव संकल्प, तपस्या और लोककल्याण की भावना का प्रतीक है। भगीरथ का तप हमें यह प्रेरणा देता है कि दृढ़ इच्छाशक्ति से असंभव कार्य भी संभव किए जा सकते हैं।

अपने लेख में शांति सोनी ने वर्तमान पर्यावरण संकट पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज पृथ्वी जल-संकट, प्रदूषण और पर्यावरणीय असंतुलन जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रही है। नदियाँ प्रदूषित हो रही हैं, भूजल स्तर लगातार गिर रहा है और जंगलों का विनाश प्रकृति संतुलन को प्रभावित कर रहा है। ऐसे समय में गंगादशहरा का संदेश और अधिक प्रासंगिक हो जाता है।

उन्होंने कहा कि जल प्रकृति का अमृत है और पृथ्वी पर जीवन का आधार भी। वैज्ञानिक दृष्टि से पृथ्वी का अधिकांश भाग जल से ढका होने के बावजूद पीने योग्य जल अत्यंत सीमित है। भूजल का अत्यधिक दोहन, नदियों में औद्योगिक कचरे का प्रवाह और वर्षाजल संरक्षण की उपेक्षा भविष्य के लिए गंभीर खतरा बन चुकी है। इसलिए जल संरक्षण को जनआंदोलन का स्वरूप देना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

शांति सोनी ने भारतीय संस्कृति की प्रकृति-पूजक परंपरा को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जोड़ते हुए कहा कि भारत में नदियों को माता, वृक्षों को देवता और पर्वतों को आराध्य मानने की परंपरा केवल धार्मिक भावना नहीं, बल्कि प्रकृति संरक्षण का अत्यंत वैज्ञानिक उपाय है। जब मनुष्य किसी तत्व को पूज्य मानता है, तब उसके संरक्षण का भाव स्वतः विकसित हो जाता है।

उन्होंने गंगा जल की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए लिखा कि वैज्ञानिक शोधों में गंगा जल में अद्भुत रोगाणुनाशक क्षमता पाई गई है। उसमें मौजूद विशेष प्रकार के बैक्टीरियोफेज हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करने में सक्षम होते हैं। यही कारण है कि गंगा जल लंबे समय तक सुरक्षित रहता है। किंतु आधुनिक प्रदूषण और मानव की लापरवाही ने इस पवित्र धारा को संकट में डाल दिया है।

लेख में शांति सोनी ने यह भी कहा कि गंगादशहरा केवल स्नान और पूजा का पर्व नहीं, बल्कि आत्ममंथन और प्रकृति संरक्षण का संकल्प लेने का अवसर है। यदि हम वास्तव में गंगा को माँ मानते हैं, तो हमें उसके अस्तित्व की रक्षा करनी होगी। नदी किनारे वृक्षारोपण, प्लास्टिक मुक्त अभियान, वर्षाजल संचयन और जल के विवेकपूर्ण उपयोग को जनभागीदारी से जोड़ना होगा।

उन्होंने हिमालय और गंगा को भारत की पहचान बताते हुए लिखा कि यदि हिमालय भारत का मुकुट है, तो गंगा उसकी जीवनदायिनी आत्मा है। हिमालय की विराटता साहस और अटलता का प्रतीक है, वहीं गंगा की निर्मल धारा मानवता, समरसता और जीवन का संदेश देती है। भगवान Krishna द्वारा गीता में कहा गया “नदियों में मैं गंगा हूँ” कथन गंगा की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्ता को और अधिक स्पष्ट करता है।

शांति सोनी ने अपने लेख में चेतावनी देते हुए कहा कि यदि हिमालय के ग्लेशियर पिघलते रहे और नदियाँ प्रदूषण से भरती रहीं, तो आने वाले समय में मानव सभ्यता गंभीर संकट में पड़ सकती है। इसलिए गंगा और हिमालय की रक्षा करना केवल पर्यावरण का विषय नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व की सुरक्षा का प्रश्न है।

उन्होंने समाज से आह्वान किया कि गंगादशहरा को केवल धार्मिक उत्सव तक सीमित न रखकर इसे पर्यावरणीय जनजागरण अभियान बनाया जाए। विद्यालयों, महाविद्यालयों और सामाजिक संस्थाओं को वृक्षारोपण, नदी स्वच्छता अभियान, जल संरक्षण रैली और जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करने चाहिए ताकि नई पीढ़ी प्रकृति संरक्षण के महत्व को समझ सके।

लेख के अंत में शांति सोनी ने संदेश दिया कि आध्यात्म और विज्ञान एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। भारतीय संस्कृति ने प्रकृति संरक्षण को धर्म से जोड़कर समाज को सदियों पहले ही वैज्ञानिक जीवनशैली का मार्ग दिखाया था। गंगादशहरा का पर्व हमें यही प्रेरणा देता है कि जल, जंगल, जमीन और पर्यावरण की रक्षा करके ही मानव सभ्यता सुरक्षित रह सकती है।

“आओ मिलकर प्रण ये लें, जल का मान बढ़ाएँगे,

सूखी धरती की पलकों पर हरियाली फिर से लाएँगे।

गंगा की निर्मल धारा सा मन भी स्वच्छ बनाएँगे,

प्रकृति-संतुलन के पथ पर नवयुग के दीप जलाएँगे।”