हिंदी पत्रकारिता के गौरवशाली इतिहास और ‘उदन्त मार्तण्ड’ की विरासत पर मंथन कोलकाता में द्वि-दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न, देशभर के विद्वानों ने पत्रकारिता के वर्तमान और भविष्य पर रखे विचार
कोलकाता, 30 मई। हिंदी पत्रकारिता की दो सौ वर्षों से अधिक पुरानी गौरवशाली परंपरा, उसकी सामाजिक-सांस्कृतिक भूमिका तथा आधुनिक समय की चुनौतियों और संभावनाओं पर केंद्रित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का सफल आयोजन कोलकाता के कलकत्ता गर्ल्स कॉलेज में संपन्न हुआ। कलकत्ता गर्ल्स कॉलेज एवं भारतीय हिंदी प्राध्यापक परिषद के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस महत्वपूर्ण संगोष्ठी का विषय था – “हिंदी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति के विकास में पत्रकारिता का योगदान”।
यह आयोजन केवल एक अकादमिक विमर्श नहीं था, बल्कि हिंदी पत्रकारिता के इतिहास, उसके संघर्ष, राष्ट्र निर्माण में उसकी भूमिका और डिजिटल युग में उसकी प्रासंगिकता पर गंभीर चिंतन का अवसर भी बना। देश के विभिन्न राज्यों तथा नेपाल सहित दक्षिण एशिया के अनेक विद्वानों, पत्रकारों, शोधार्थियों और शिक्षाविदों ने इसमें भाग लेकर अपने विचार प्रस्तुत किए।
‘उदन्त मार्तण्ड’ से आरंभ हुई हिंदी पत्रकारिता की स्वर्णिम यात्रा
संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए श्री वेंकटेश्वर विश्वविद्यालय, सिक्किम के कुलपति प्रो. मोहन ने कहा कि नवजागरण की भूमि बंगाल में ‘उदन्त मार्तण्ड’ के प्रकाशन के साथ प्रारंभ हुई हिंदी पत्रकारिता ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में जनचेतना जगाने और राष्ट्रीय अस्मिता को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता केवल सूचना का माध्यम नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने वाली शक्ति है।
प्रख्यात साहित्यकार डॉ. प्रेमशंकर ने पत्रकारिता की वर्तमान स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए बशीर बद्र की प्रसिद्ध पंक्ति “जी बहुत चाहता है सच बोले, हौसला नहीं होता” का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि आज पत्रकारिता के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और नैतिक चेतना को निष्पक्ष रूप से समाज तक पहुँचाने की है।
भारतीय हिंदी प्राध्यापक परिषद के अध्यक्ष प्रो. विनोद कुमार मिश्र ने कहा कि कलम की शक्ति सदैव तलवार से अधिक प्रभावी रही है। अंग्रेजी शासन पत्रकारिता की इसी ताकत से भयभीत था, इसलिए अनेक पत्र-पत्रिकाओं पर प्रतिबंध लगाए गए और उनकी जमानतें जब्त की गईं।
वरिष्ठ पत्रकार राज मिठौलिया ने हिंदी पत्रकारिता के शुरुआती संघर्षों का उल्लेख करते हुए कहा कि आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद आरंभिक पत्र-पत्रिकाओं ने अपने आदर्शों से समझौता नहीं किया। उन्होंने कहा कि वर्तमान पत्रकारिता को भी मूल्यों और सामाजिक उत्तरदायित्व को सर्वोपरि रखना होगा।
पत्रकारिता भारतीय सांस्कृतिक चेतना का वाहक
कलकत्ता गर्ल्स कॉलेज की प्राचार्या प्रो. सत्या उपाध्याय ने स्वागत भाषण में कहा कि यह आयोजन भारतीय भाषिक चेतना, सांस्कृतिक अस्मिता और राष्ट्रीय नवजागरण की उस ऐतिहासिक विरासत का स्मरण है जिसकी पहली ज्योति इसी कोलकाता की धरती पर प्रज्वलित हुई थी।
भारतीय हिंदी प्राध्यापक परिषद के महासचिव प्रो. संजीव कुमार दुबे ने परिषद की गतिविधियों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संस्था पूरे देश के हिंदी प्राध्यापकों को एक साझा मंच प्रदान कर अकादमिक उन्नयन और क्षमता संवर्धन की दिशा में कार्य कर रही है। उन्होंने कहा कि बदलते समय में पत्रकारिता को भाषा की शिष्टता, साहित्य की संवेदना और सामाजिक सरोकारों की रक्षा का दायित्व निभाना होगा।
उद्घाटन सत्र में केरल की प्रो. जयश्री, तेलंगाना की प्रो. रेखारानी तथा आंध्र प्रदेश के प्रो. रामप्रकाश ने भी पत्रकारिता और हिंदी भाषा के विकास पर अपने विचार रखे। कार्यक्रम का शुभारंभ जोइता सिंह एवं मधुमिता मांझी द्वारा प्रस्तुत स्वागत गीत “ओ जीवन पुण्य करो” से हुआ।
इस अवसर पर ‘हिंदी पत्रकारिता में भाषा, साहित्य और संस्कृति’, ‘नागार्जुन और युद्ध प्रसाद मिश्र की प्रतिनिधि कविताएँ’ तथा ‘आलोचना के निकष’ जैसी महत्वपूर्ण पुस्तकों का लोकार्पण भी किया गया।
पत्रकारिता का मूल तत्व – संवेदना और सत्य
प्रथम तकनीकी सत्र में अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय, तेलंगाना की डॉ. प्रियदर्शिनी, गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय की प्रो. गौरी त्रिपाठी तथा बाराबंकी की प्रो. रीना सिंह ने हिंदी की लघु पत्रिकाओं की भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता का मूल उद्देश्य समाज में “सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम्” की स्थापना है।
सत्राध्यक्ष प्रो. शंभूनाथ तिवारी ने कहा कि पत्रकारिता का मूल आधार वेदना और संवेदना है। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता और साहित्य एक-दूसरे के पूरक हैं तथा कलकत्ता ने हिंदी पत्रकारिता को नवीन दृष्टि और दिशा प्रदान की है।
पत्रकारिता ने अंधविश्वास और रूढ़ियों पर किया प्रहार
द्वितीय तकनीकी सत्र में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की प्रो. अमर ज्योति, महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय के डॉ. ललित कुमार सिंह, केरल की डॉ. कला ए. तथा लखनऊ विश्वविद्यालय की प्रो. श्रुति ने पत्रकारिता की सामाजिक भूमिका पर विचार रखे।
वक्ताओं ने कहा कि पत्रकारिता केवल समाचारों का माध्यम नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक संरक्षण, साहित्यिक मूल्यांकन और राष्ट्रीय चेतना के विकास का सशक्त साधन भी है। पत्रकारिता ने समय-समय पर सामाजिक कुरीतियों, अंधविश्वासों और बाह्याचारों पर प्रहार कर समाज को नई दिशा दी है।
कलकत्ता विश्वविद्यालय की हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. राजश्री शुक्ला ने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि बंगाल की धरती ‘वंदे मातरम्’ की जननी रही है और भारतीय पत्रकारिता की अनेक परंपराओं का जन्मस्थान भी। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता के लिए निर्भीकता, विवेक और मेधा अनिवार्य गुण हैं।
डिजिटल युग में पत्रकारिता की नई चुनौतियाँ
तृतीय तकनीकी सत्र में गोवा की डॉ. रमिता गुरव, आसनसोल के डॉ. कृष्ण कुमार श्रीवास्तव, उत्तर प्रदेश के प्रो. गौरव तिवारी तथा सागर विश्वविद्यालय के डॉ. आशीष द्विवेदी ने भाषाई अस्मिता, ई-साहित्यिक पत्रकारिता और अज्ञेय की पत्रकारिता संबंधी दृष्टि पर विचार प्रस्तुत किए।
सत्राध्यक्ष प्रो. स्मिता मिश्र ने कहा कि पत्रकारिता को अतीत की गौरवशाली परंपराओं से प्रेरणा लेते हुए भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार होना होगा। तकनीकी युग में भी हिंदी साहित्य और पत्रकारिता का परस्पर संवाद बना रहना आवश्यक है।
देशभर से आए शोधार्थियों ने प्रस्तुत किए शोध-पत्र
संगोष्ठी के दूसरे दिन आयोजित पाँच समानांतर तकनीकी सत्रों में देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों से आए लगभग 100 शोधार्थियों ने अपने शोध-पत्र प्रस्तुत किए। शोध-पत्रों में हिंदी पत्रकारिता के इतिहास, भाषा-विकास, राष्ट्रवाद, डिजिटल मीडिया, राजभाषा, जनसंचार और साहित्यिक पत्रकारिता जैसे विषयों पर व्यापक चर्चा हुई।
सत्रों की अध्यक्षता करने वाले विद्वानों ने कहा कि हिंदी पत्रकारिता ने समय-समय पर भारतीय समाज को जागृत और संगठित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। उन्होंने चेतावनी दी कि पत्रकारिता में पूर्वाग्रह, राजनीतिक आग्रह और पक्षधरता लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए घातक हो सकते हैं। ई-पत्रकारिता के इस दौर में पत्रकारों को अधिक सतर्क, उत्तरदायी और निष्पक्ष रहने की आवश्यकता है।
सम्मान समारोह में विभूतियों का हुआ अभिनंदन
समापन सत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ की विरासत को समर्पित रहा। इस अवसर पर सार्क जर्नलिस्ट फोरम की अंतरराष्ट्रीय सदस्य प्रो. स्मिता मिश्र ने संगठन के उद्देश्यों और पत्रकारिता के क्षेत्र में उसकी भूमिका पर प्रकाश डाला।
नेपाल से आए विशिष्ट अतिथि रुद्र सुवेदी ने नेपाली पत्रकारिता के विकास में हिंदी पत्रकारिता के योगदान का उल्लेख किया और दक्षिण एशियाई देशों के बीच भाषाई एवं सांस्कृतिक संवाद को मजबूत बनाने की आवश्यकता बताई।
समारोह में सार्क जर्नलिस्ट फोरम की ओर से अनेक पत्रकारों, शिक्षाविदों और साहित्यकारों को “स्मृति सम्मान” तथा “उदन्त मार्तण्ड शिखर सम्मान” से सम्मानित किया गया। सम्मानित व्यक्तियों में रुद्र सुवेदी, प्रो. स्मिता मिश्र, प्रो. राजेश पासवान, प्रो. शंभूनाथ तिवारी, मो. शादाब, युवराज पाण्डेय, शशिभूषण सिंह, अज़मत अली सिद्दीकी, अमर खड़का नेपाल सहित अनेक विशिष्ट नाम शामिल रहे।
पत्रकारिता की विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का संकल्प
दो दिवसीय संगोष्ठी ने यह स्पष्ट किया कि हिंदी पत्रकारिता केवल समाचारों का इतिहास नहीं, बल्कि भारतीय समाज, संस्कृति और राष्ट्रीय चेतना के विकास की एक जीवंत परंपरा है। ‘उदन्त मार्तण्ड’ से प्रारंभ हुई यह यात्रा आज डिजिटल युग तक पहुँच चुकी है, लेकिन इसके मूल मूल्य—सत्य, निष्पक्षता, जनहित और सामाजिक उत्तरदायित्व—आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं।
संगोष्ठी के समापन पर आयोजकों ने हिंदी पत्रकारिता की इस गौरवशाली विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाने तथा पत्रकारिता को अधिक जिम्मेदार, संवेदनशील और लोकतांत्रिक बनाने का संकल्प व्यक्त किया। सांस्कृतिक कार्यक्रमों, शोध-विमर्श और सम्मान समारोहों से समृद्ध यह आयोजन हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में याद किया जाएगा।
