शांति सोनी ने रासबिहारी बोस की जयंती पर किया स्मरण, कहा — राष्ट्रभक्ति की अमर ज्योति हैं महान क्रांतिकारी “जिनकी चेतना में जलती थी आज़ादी की अग्नि, जिनके साहस से काँप उठा था अंग्रेजी साम्राज्य — ऐसे अमर क्रांतिकारी रासबिहारी बोस को शत-शत नमन।”

 “रक्त रगों में देश हो, श्वासों में स्वाभिमान,

माटी के कण-कण में दिखे भारत माँ की शान।

जिनके साहस सूर्य से, जिनकी ज्वाला अग्नि समान,

वंदन उन वीरों को जिनसे गौरवमय हिंदुस्तान।”








भारत का स्वतंत्रता संग्राम केवल इतिहास का एक अध्याय नहीं, बल्कि त्याग, बलिदान, साहस और राष्ट्रप्रेम की वह अमर गाथा है जिसने करोड़ों भारतीयों के हृदय में स्वतंत्रता की अलख जगाई। इस महान संघर्ष में अनेक वीरों ने अपने प्राणों की आहुति देकर भारत माँ को स्वतंत्र कराने का मार्ग प्रशस्त किया। उन्हीं अमर क्रांतिकारियों में एक तेजस्वी और अद्भुत व्यक्तित्व थे महान स्वतंत्रता सेनानी रासबिहारी बोस, जिनकी जयंती पर वरिष्ठ पत्रकार शांति सोनी ने उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि उनका जीवन आज भी युवाओं के लिए प्रेरणा का अखंड स्रोत है।

शांति सोनी ने कहा कि रासबिहारी बोस केवल एक क्रांतिकारी नहीं थे, बल्कि वे उस राष्ट्रवादी चेतना के अग्रदूत थे, जिन्होंने विदेशी शासन की जड़ों को हिलाकर रख दिया। उनका सम्पूर्ण जीवन मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए समर्पित रहा। उन्होंने अपने विचारों, साहस और दूरदृष्टि से स्वतंत्रता आंदोलन को नई ऊर्जा प्रदान की। आज का भारत जिन स्वतंत्र हवाओं में साँस ले रहा है, उसके पीछे ऐसे अनगिनत वीरों का त्याग और संघर्ष छिपा हुआ है।

उन्होंने कहा कि 25 मई 1886 को बंगाल में जन्मे रासबिहारी बोस बचपन से ही अत्यंत मेधावी, संवेदनशील और राष्ट्रभक्त थे। अंग्रेजों के अत्याचारों को देखकर उनके मन में विद्रोह की ज्वाला धधक उठी थी। युवावस्था में ही उन्होंने यह प्रण ले लिया था कि वे अपने जीवन का प्रत्येक क्षण देश की स्वतंत्रता के लिए समर्पित करेंगे। उनका राष्ट्रप्रेम केवल भावनाओं तक सीमित नहीं था, बल्कि वह कर्म, संघर्ष और बलिदान के रूप में दिखाई देता था।

शांति सोनी ने कहा कि रासबिहारी बोस का साहस अद्वितीय था। वर्ष 1912 में अंग्रेज वायसराय लॉर्ड हार्डिंग पर हुए बम हमले के पीछे उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। इस घटना ने अंग्रेजी शासन को हिला दिया था। अंग्रेज सरकार उन्हें पकड़ने के लिए लगातार प्रयास करती रही, लेकिन उनकी बुद्धिमत्ता, संगठन क्षमता और अद्भुत रणनीति के कारण वे हर बार गिरफ्त से बच निकलते थे। उनका जीवन किसी क्रांतिकारी उपन्यास से कम नहीं था।

उन्होंने आगे कहा कि रासबिहारी बोस ने केवल भारत में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी स्वतंत्रता आंदोलन को मजबूती प्रदान की। अंग्रेजों की कड़ी निगरानी से बचते हुए वे जापान पहुँचे, जहाँ उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने का ऐतिहासिक कार्य किया। विदेशी धरती पर रहते हुए भी उनका मन, उनकी आत्मा और उनका समर्पण सदैव भारत माता के चरणों में ही समर्पित रहा।

शांति सोनी ने कहा कि रासबिहारी बोस की सबसे बड़ी उपलब्धियों में “इंडियन इंडिपेंडेंस लीग” की स्थापना और “आज़ाद हिंद फौज” की आधारशिला तैयार करना शामिल है। बाद में इसी आंदोलन को नेताजी Subhas Chandra Bose ने नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। रासबिहारी बोस ने नेताजी को नेतृत्व सौंपते हुए जिस त्याग, दूरदृष्टि और राष्ट्रहित का परिचय दिया, वह भारतीय इतिहास में सदैव स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगा।

उन्होंने कहा कि रासबिहारी बोस का सम्पूर्ण जीवन हमें यह संदेश देता है कि सच्चा देशप्रेम केवल भाषणों से नहीं, बल्कि त्याग, संघर्ष और समर्पण से सिद्ध होता है। उन्होंने सुख-सुविधाओं का त्याग कर राष्ट्रसेवा को अपना धर्म बनाया। उनका जीवन युवाओं को यह प्रेरणा देता है कि यदि लक्ष्य राष्ट्रहित हो, तो कठिन से कठिन परिस्थितियाँ भी मनुष्य के कदमों को रोक नहीं सकतीं।

शांति सोनी ने युवाओं से आह्वान करते हुए कहा कि आज के समय में देश के प्रति जिम्मेदारी, नैतिकता और राष्ट्रीय चेतना को मजबूत करने की आवश्यकता है। हमें उन क्रांतिकारियों के आदर्शों को आत्मसात करना चाहिए जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर भारत को स्वतंत्र कराया। रासबिहारी बोस जैसे महानायक केवल इतिहास के पात्र नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा हैं।

उन्होंने अंत में कहा कि भारत माँ का यह अमर सपूत सदैव देशवासियों के हृदय में जीवित रहेगा। रासबिहारी बोस का जीवन आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करता रहेगा कि मातृभूमि से बढ़कर कोई धर्म नहीं और राष्ट्रसेवा से बड़ा कोई कर्म नहीं। उनके त्याग, संघर्ष और अदम्य साहस को राष्ट्र कभी भुला नहीं सकता।

“वंदन उस वीर क्रांतिकारी को,

जिसने आज़ादी का दीप जलाया।

अपने त्याग और तपस्या से,

भारत का गौरव बढ़ाया।”