बिलासपुर, छत्तीसगढ़।
भारतीय संस्कृति और प्रकृति चेतना को केंद्र में रखकर राष्ट्रीय सचिव “जीवन धारा नमामि गंगे” शांति सोनी ने “नौतपा माँ वसुन्धरा का महान तप” शीर्षक से एक अत्यंत प्रेरणादायक एवं पर्यावरण जागरूकता से परिपूर्ण लेख प्रस्तुत किया है। यह लेख केवल साहित्यिक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि जल, जंगल और जमीन के संरक्षण का जनसंदेश बनकर उभरा है। अपने लेख में उन्होंने नौतपा के वैज्ञानिक, पर्यावरणीय, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व को अत्यंत सरल एवं प्रभावशाली शब्दों में प्रस्तुत किया है।
लेख की शुरुआत प्रकृति वंदना और जल संरक्षण के संदेश से होती है—
“जल की जपती मंत्र-ध्वनि, गंगा निर्मल नीर।
धरती के कण-कण बसे, जीवन के गंभीर।।"
इन पंक्तियों के माध्यम से शांति सोनी ने प्रकृति और मानव जीवन के गहरे संबंध को उजागर किया है। उन्होंने बताया कि नौतपा केवल गर्मी का समय नहीं, बल्कि प्रकृति का महान तप है, जो संपूर्ण जीवनचक्र को संतुलित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
उन्होंने अपने लेख में विस्तार से समझाया कि ज्येष्ठ मास में आने वाले नौतपा के नौ दिन सूर्य की प्रखर ऊर्जा के माध्यम से धरती, जल और वातावरण को नई शक्ति प्रदान करते हैं। यह काल वर्षा चक्र की तैयारी का महत्वपूर्ण चरण होता है। सूर्य की तीव्र किरणों से जल का वाष्पीकरण होता है, जिससे बादलों का निर्माण होता है और आगे चलकर वर्षा होती है। यदि नौतपा संतुलित न हो, तो इसका सीधा प्रभाव कृषि और पर्यावरण पर पड़ता है।
शांति सोनी ने जंगलों के महत्व को भी अत्यंत प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि नौतपा के दौरान वृक्ष अपनी जड़ों को और अधिक गहराई तक फैलाते हैं, जिससे भूजल संरक्षण होता है और धरती का कटाव रुकता है। वृक्षों की हरियाली वातावरण में शीतलता बनाए रखती है। उन्होंने बढ़ती कटाई और शहरीकरण पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यदि जंगल समाप्त हो गए, तो नौतपा की गर्मी विनाशकारी रूप धारण कर सकती है। इसलिए वृक्षारोपण केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि मानव जीवन की सुरक्षा का संकल्प है।
लेख में मिट्टी और भूमि की उपयोगिता को भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझाया गया है। उन्होंने उल्लेख किया कि सूर्य की तेज तपिश मिट्टी में मौजूद हानिकारक जीवाणुओं और कीटों को नष्ट कर भूमि को शुद्ध करती है। यही कारण है कि भारतीय किसान सदियों से संतुलित नौतपा को अच्छी वर्षा और बेहतर कृषि उत्पादन का आधार मानते आए हैं।
शांति सोनी ने नौतपा के आध्यात्मिक पक्ष को भी अत्यंत भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में सूर्य ऊर्जा, तप और जीवन का प्रतीक है। इस काल में जल संरक्षण, पशु-पक्षियों के लिए दाना-पानी की व्यवस्था और वृक्षों की रक्षा जैसे कार्य पुण्य माने जाते हैं। यह समय मानव को प्रकृति के प्रति अपने कर्तव्यों का स्मरण कराता है।
उन्होंने “नमामि गंगे” अभियान का उल्लेख करते हुए कहा कि जब हम नदियों को स्वच्छ रखने का संकल्प लेते हैं, तब वास्तव में हम जल, जंगल और जमीन तीनों की रक्षा कर रहे होते हैं। वर्तमान समय में वैश्विक तापवृद्धि, जल संकट और पर्यावरण प्रदूषण जैसी चुनौतियों के बीच यह लेख समाज को प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर चलने की प्रेरणा देता है।
लेख का सबसे भावुक और प्रेरणादायक हिस्सा वह है, जहाँ शांति सोनी ने “जीवन धारा नमामि गंगे” के संरक्षक डॉ. हरिओम शर्मा के कार्यों का उल्लेख किया है। उन्होंने उन्हें आधुनिक भागीरथ बताते हुए कहा कि उन्होंने निष्प्राण हो चुकी नीम नदी को अपने कठोर तप, श्रम और संकल्प से पुनर्जीवित कर दिया। सूखी पड़ी नदी में फिर से जल प्रवाहित हुआ और आसपास की धरती, वनस्पति तथा जीव-जंतु पुनः जीवन से भर उठे।
उन्होंने डॉ. हरिओम शर्मा के सम्मान में भावपूर्ण पंक्तियाँ लिखीं—
“भागीरथ के पुण्य सम, हरिओम का नाम।
गंगा-रक्षा यज्ञ में, जलता दिव्य धाम।।"
“सूखी धरती गा उठी, पाकर फिर से नीर।
वन-पंछी मुस्का उठे, हरषित हुआ समीर।।"
इन पंक्तियों के माध्यम से उन्होंने जल संरक्षण और पर्यावरण रक्षा के लिए समर्पित व्यक्तित्वों को समाज का वास्तविक प्रेरणास्रोत बताया।
शांति सोनी का यह लेख केवल साहित्यिक रचना नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का एक सशक्त जनआंदोलन प्रतीत होता है। इसमें भारतीय संस्कृति, प्रकृति विज्ञान और सामाजिक चेतना का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। लेख समाज को यह संदेश देता है कि यदि मानवता को सुरक्षित रखना है, तो जल, जंगल और जमीन की रक्षा को जीवन का सबसे बड़ा धर्म बनाना होगा।
राष्ट्रीय सचिव “जीवन धारा नमामि गंगे” शांति सोनी की यह रचना पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में समाज को नई दिशा देने वाली प्रेरणादायक प्रस्तुति मानी जा रही है।



